धर्मगुरु और बिल्ली का बच्चा

एक बुद्ध धर्मगुरु थे। उनके कई अनुयायी थे। वह रोज़ सत्संग करते और ध्यान में बैठते थे। एक बार उन्हें रस्ते में एक बिल्ली का बच्चा मिला। वो उस बिल्ली के बच्चे को अपने साथ ले आए। अब जब भी वो ध्यान में बैठे तो बिल्ली का बचा उनके शरीर के साथ खेलने लग जाता और उन्हें तंग करता। अब उन्होंने अपने अनुयायियों से उस बच्चे को बांधने को बोला।अब जब भी वो ध्यान में बैठते तो उस बिल्ली के बच्चे को बाँध दिया जाता।ऐसा कई वर्षो तक होता रहा।
एक दिन उन बुध धर्मगुरु की मृत्यु हो जाती है तो उनके एक शिष्य को उनकी गद्दी पर बैठाया जाता है मगर उस बिल्ली को बच्चे को बांधना अभी भी जारी रहता है। एक दिन वो बिल्ली का बच्चा भी मर जाता है। अब तो जैसे भूचाल सा ही आ गया। एक नया बिल्ली का बच्चा लाया जाता है और उसकी जगह पर बाँधना शुरू कर दिया जाता है।
इस तरह वह की एक परिक्रिया बन जाती है एक जब धर्मगुरु मरता है तो नया धर्मगुरु आता है और जब बिल्ली का बच्चा मरता है तो वो नया आता है। किसी को कुछ नहीं पता के यह बिल्ली का बच्चा क्यों बाँधा जाता है।
कहने का यह अर्थ है के मान्यताएं सदियों से चले आ रहे है मगर किसी को नहीं मालूम के कब से यह शुरू हुआ और इसके पीछे की वजह क्या थी। बस आज भी हम उसे निभाते चले आ रहे है। क्या हम दिल से अपने रिवाज़ो के प्रति जागरूक है या फिर मान्यतायों को आँखें बांधे दिखावे के लिए करते जा रहे है।        ।। सोचिये ।।

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